राजस्थान के पत्रकार नारायण बारहठ ने हाल ही में एक फेसबुक पोस्ट लिखा है. यादगार पोस्ट है. इसमें उन ‘हरामखोर, नमकहराम’ पत्रकारों का जिक्र है, जिन्होंने देश हित में काम नहीं किया, लेकिन  फिर भी वो महान थे. कई बार देश से बढ़ कर इनसानीयत होती है, और उसके लिए काम करना जरूरी है.

नारायण बारहठ की ये रिपोर्ट.. उनकी फेसबुक वॉल से साभार…

अपनेअपने कृत्घन
अपने अपने गद्दार ।
वे गद्दार थे ?
वे नमक के प्रति वफादार नहीं थे ?
बेंजामिन होर्नीमन इंग्लैंड में पैदा हुए ,
द स्टेसमैन [कलकत्ता ] के न्यूज़ एडिटर के बतौर नियुक्ति हुई। उन दिनों द स्टेट्समैन अंग्रेज हुकूमत से पोषित और संचालित था। बेंजामिन से कहा गया कि वे अख़बार में ब्रिटिश हितो का ख्याल रखे।पर उन्होंने इंकार कर दिया। कहा मेरी वफ़ादारी मेरे पाठको के प्रति है/ उनकी अपने अंग्रेज मालिको से पटरी नहीं बैठी। वे नमक हराम हो गए। बेंजामिन ने मुम्बई का रुख किया [1913 ]और फिरोजशाह मेहता के बॉम्बे क्रॉनिकल के सम्पादक हो गए।
मेहता और उनका अख़बार उन दिनों ब्रिटिश सरकार से लोहा ले रहे थे।वे पारसी थे और भारत की जंगे आज़ादी में अहम किरदार थे। बेंजामिन ने गद्दारी की। कदाचित पहले पत्रकार थे जिन्होंने चुपके चुपके जलियावाला नरसंहार की तस्वीरे और जानकारी इक्क्ठा की। फिर इसे ब्रिटेन की लेबर पार्टी के मुख पत्र डेली हेराल्ड में प्रकाशित करवा दिया।उनकी रिपोर्ट ने दुनिया को हिला दिया। अंग्रेज हुकूमत कटघरे में खड़ी हो गई।बेंजामिन को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया और वापस ब्रिटेन भेज दिया। उनके रिपोर्टर गोवर्धन दास को तीन महीने की सजा हुई।
उन्ही दिनों एक और अंग्रेज इयान स्टीफन द स्टेट्समैन के सम्पादक थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जलियांवाला नरसंहार के विरोध में ब्रिटिश सम्मान लौटाते हुए सरकार को बहुत कड़ा पत्र लिखा। स्टीफन ने उसे हूबहू छापा और अपने ही देश की सरकार का चेहरा उजागर कर दिया। फिर बंगाल में भीषण अकाल पड़ा। उसी अख़बार ने जम कर रिपोर्ट छापी। स्टिफंन गद्दार हो गए।
बीबीसी पर बहुत सवाल किये जाते है। 1982 में फाकलैंड द्वीप को लेकर ब्रिटैन और अर्जेंटीना में जंग छिड़ गई। इस युद्ध के कवरेज में बीबीसी ने वही किया। प्रधान मंत्री मार्गरेट थैचर बहुत खफा हुई/ क्योंकि बीबीसी ने अपनी रीती नीति के साथ सुलह नहीं की / थैचर को यह गवारा नही हुआ। उन्हें ऐतराज था कि बीबीसी अपनी खबरों में ऐसा क्यों नहीं कहता कि हमारे सैनिक और अर्जेंटीना के सैनको में भिड़ंत हुई। सम्पादक तलब हुए। पर बीबीसी ने कोई समझौता नही किया। बीबीसी को तब नमक हराम कहा गया।
थैचर ने कहा -मुझे हमेशा अपने सैनको की चिंन्ता रहती है और उन्हें अपनी खबरों की “My concern was always the safety of our forces. Theirs was news.”।
कहने लगी – वे ऐसे रिपोर्टिंग करते है जैसे जंग ब्रिटैन और अर्जेंटीना में है और बीबीसी तटस्थ है। कई बार जब वे खुली चर्चा कराते है तो लगता है जैसे वे इस लड़ाई में दुश्मन की मदद कर रहे हो।बीबीसी पर वामपंथी झुकाव का आरोप लगा। बीबीसी ने अपने रिपोर्टर्स को गाइड लाइन दोहराई –
” हमें हर हाल में तटस्थ रहना है। जब ब्रिटैन का उल्लेख करे तो यह नही कहे कि हमारे सैनिक। क्योंकि हम ब्रिटैन नहीं है ,हम बीबीसी है ” BBC guidelines instructed reporters to remain neutral during the campaign. “We should try to avoid using ‘our’ when we mean British,” they read. “We are not Britain. We are the BBC.”
थैचर के आत्मकथा में इस विवाद का जिक्र है। एक वक्त ऐसा भी आया जब थैचर इतनी नाराज हुई कि आपात कानून का इस्तेमाल कर बीबीसी को सरकारी नियंत्रण में लेने पर सोचा जाने लगा।
अमेरिका ने साठ के दशक में वियतनाम पर हमला किया। सैंकड़ो पत्रकारों ने वियतनाम का रुख किया। इस जंग में लाखो लोग मारे गए। अमेरिकन पत्रकार ‘गद्दार’ हो गए।ऐसी ऐसा रिपोर्टे भेजी कि अमेरिका का चेहरा बेनकाब हो गया। इन् अमेरिकन रिपोर्टरो की खबरों से जनमत अमेरिका के खिलाफ हो गया।
राष्ट्रपति निक्सन कहने लगे – कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब सुबह के अख़बार और शाम के टीवी में ऐसे खबरे न दिखाई जाती हो जैसे सारा मानवीय संकट विएतनाम में ही हो रहा है। फिर एक दिन अमेरिकन राष्ट्रपति बोले -” लगातार की जा रही इस रिपोर्टिंग के पीछे जो भी मकसद हो/मगर इससे हमारे लोगो का मनोबल गिरता है। ऐसा ही रहा तो क्या कभी अमेरिका विदेश में दुश्मनो के खिलाफ कोई जंग जीत सकेगा ” /
ऐसे ही ‘गद्दारो ‘ की फेहरिस्त में अभी अभी एक और नाम शामिल हुआ है। हमारे पड़ोसी देश में एक पत्रकार सिरिल अलमेडा ने इस सूचि में अपना नाम लिखवा लिया। क्योंकि उनकी रिपोर्ट से पाकिस्तान की फ़ौज सवालो के घेरे में आ गई। शायर -कवि और लेखक भी इसमें अपना नाम दर्ज कराते रहे है।
हर दौर और देश में ऐसे ‘गद्दार और नमक हराम ‘ होते रहे है। पर न जाने क्यों टूटी थकी -लूटी पिटी ‘इंसानियत ‘ इन नमक हरामो में आशा की एक किरण देखती रही है।
सादर
नोट -यह विएतनाम युद्ध की तस्वीर है। कहते है एक तस्वीर हजार शब्दो से ज्यादा असर करती है। इस तस्वीर ने दुनिया को हिला दिया था।पत्रकारो ने ऐसी और भी तस्वीरे समय और समाज के सामने रखी थी।

 

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